मन की मन से मन में
- मनोनय | Manonay
- Jul 24, 2020
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ऐसा नशा लिए फिरती हो आँखों में,
शमा, नाचती दिखती है उनमे।
उन आँखों के अंतहीन सीढ़ियों की गलयारों में,
गूंजती आजाद मन की राग।
तेरी हसी अधरों की करवट यूं मुस्कान बन,
मेरी, ह्रदय लय बनती है।
मोती सम श्वेत दांत देख, क्षणिक थमती है।
तेरे मन की हंसी है ,
जो की शाश्वत ही उन्मुक्त है, मनो-प्रिए !
मैं उन यादों को लिए,
चकोर सम ताक रहा, एक दीदार के लिए।
ढूंढ़ता तेरी ही शीतल छाव।
तेरे केश मखमली, मानो तूफ़ान लिए लहराती है।
मेरा मन बहुत डरता है,
नाग सम वें डसले मुझे, लगता रहता है।
एक क्षणिक स्पर्श लेने, खोने उनमे, उंगलियाँ दौड़ती।
कह दो मुझे, बन केशमार्जारी,
उन मेखला केशो में, हीरे-मोती कर जरी,
प्रिये, व्यक्त करू मेरा ह्रदय।
पता नहीं उस बिंदी का क्या हुनर होगा ?
बेदाग चेहरे पे तूने पोता।
मेरी नज़र नहीं हटती , उसे हटना ही होगा।
मन करता है कि मैं
कुमकुम से स्पर्श करूँ, काली बिंदी लाल करूँ।
प्रिये तुझपे रंग भरु?
दोष रहित ये आकृति तेरी अप्सरा सी काया।
मेरा ये मन चित्रफलक सा,
इन अनाड़ी हाथों से तुझे उकारने से डरु।___मनोनय
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