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सुनिए हे नायक !


हे! नायक, जनता  के  जनाधीश !

चुप्पी न साधो, न धरो धीर।

सनातन धर्म कि ये दुर्दशा,

है देखो साम्प्रदायिकता का घुलता विष।

दण्डित कर इन नागफनियों को,

सजा इनका दिलाइये।

धर्म, अनुशाशन, कर्तव्यों का पाठ पढ़ाइये।


पड़ता बल देखो महाकाल के कपल।

लो जिवाह खिंच,

अन्यथा रुद्राग्नि करेगी भस्म कुसुम-सरधर समान।


पंचम ब्रह्म-मुख वेदो का दुर्वाचन करे,

रावण-अहंकार जब नंदी निंदा करे,

करे शव-अपमान स्कंध क्रुद्ध बुद्धि से,

दण्डित कीजिये, झुकने चाहिए  कलंकित शीश।

लौटाइये हमारे भातृ मित्रो का सम्मान।

अन्यथा झूठा है आपका वादा सारा,

कैसे कहे आप है 'महान'।.......मनोनय

© मनः | MANAH

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